अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा, कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर के पार
नई दिल्ली, 31 अगस्त 2026: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ने से पश्चिम एशिया में हालात गंभीर हो गए हैं। दोनों देशों के बीच ताजा सैन्य कार्रवाई का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार दिखाई दे रहा है। सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया और ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के लारक द्वीप पर दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया। यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास स्थित है। इसके बाद ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में व्यापक सैन्य टकराव और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका को फिर बढ़ा दिया है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सबसे तत्काल असर कच्चे तेल के बाजार पर पड़ा है। सोमवार के कारोबार में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़कर लगभग 90.3–90.6 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड भी बढ़कर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर संघर्ष और बढ़ता है तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल टैंकरों और अन्य जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में किसी भी बड़े व्यवधान से दुनिया के कई देशों में तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची रहने पर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका असर आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, 31 अगस्त को भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में तत्काल बदलाव नहीं हुआ।
इसके अलावा महंगा कच्चा तेल शेयर बाजार, विमानन, परिवहन और उद्योगों की लागत को भी प्रभावित कर सकता है। तेल की कीमतों में लगातार तेजी रहने पर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
दुनिया की नजर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार की नजर अमेरिका और ईरान के बीच आगे होने वाली सैन्य और कूटनीतिक गतिविधियों पर है। अगर तनाव जल्द कम होता है तो तेल की कीमतों में कुछ राहत आ सकती है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बड़े स्तर पर प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वैश्विक तेल बाजार, महंगाई, शेयर बाजार और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने की आशंका बढ़ गई है। आने वाले दिनों में ऊर्जा बाजार और पश्चिम एशिया की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।


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